नई दिल्ली। आवारा कुत्तों की समस्या पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के बाद केंद्र सरकार भी हरकत में आ गई है। अब राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए अनिवार्य कर दिया गया है कि उन्हें कम से कम 70 प्रतिशत कुत्तों की नसबंदी और एंटी-रैबिज टीकाकरण करना अनिवार्य होगा। पहले केंद्र की भूमिका केवल सुझाव तक सीमित थी, अब इसे बाध्यकारी बनाकर राज्यों की जवाबदेही तय कर दी गई है। प्रत्येक राज्य को हर महीने अपनी प्रगति रिपोर्ट भेजनी होगी, ताकि कार्रवाई केवल कागजों में बंद न रह जाए। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कहा है कि नसबंदी और टीकाकरण के बाद कुत्तों को उनकी मूल जगह पर ही छोड़ा जाए। इसी निर्देश के अनुरूप केंद्र ने भी अपनी नीति बदली है। पशुपालन मंत्रालय ने सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर कहा है कि यदि कोई राज्य पीछे रहा तो उसकी जवाबदेही तय होगी। केंद्र की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पत्र की प्राप्ति की पुष्टि और तत्काल कदमों का ब्यौरा भी मांगा गया है। केंद्र ने राज्यों को लिखे पत्र में संशोधित पशु जन्म नियंत्रण मॉडल को मानक संचालन प्रक्रिया के रूप में अपनाने को कहा है। बड़े नगरों में भोजन क्षेत्र, चोबीसों घंटे हेल्पलाइन एवं रैबिज नियंत्रण इकाइयों की स्थापना पर विशेष जोर है, ताकि नसबंदी एवं टीकाकरण का काम बिना रुकावट चलता रहे। इससे अनियंत्रित प्रजनन पर अंकुश लगेगा और नागरिक सुरक्षा में ठोस सुधार होगा। केंद्र का मानना है कि चुनौती केवल कुत्तों की बढ़ती संख्या नहीं है, बल्कि इनके काटने से लोगों में फैलने वाली बीमारी भी है। रैबिज जानलेवा है; इसलिए टीकाकरण जरूरी है। इसलिए राज्यों को निर्देश है कि वे विस्तृत मासिक रिपोर्ट पशु कल्याण बोर्ड को भेजें। इन्हीं रिपोर्टों पर तय होगा कि किस राज्य ने नियमों और अदालत के निर्देशों का पालन कितनी गंभीरता से किया।
