वाश्गिंटन : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपने फैसले से दुनिया में हलचल मचा दी है. पहले टैरिफ और अब एच्-1बी वीजा पर लगाई गई 1 लाख डॉलर एक्स्ट्रा फीस ने कई कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है. इन कंपनियों में सिर्फ विदेशी ही नहीं, बल्कि अमेरिकी कंपनियां भी शामिल हैं. इतना ही नहीं, ट्रंप के फैसले ने अमेरिका में नौकरी करने का सपना देखने वाले लोगों को राह मुश्किल कर दी है. दरअसल, एच्-1बी वीजा के जरिए हाई स्किल वाले विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका में नौकरी के लिए बुलाया जाता है. अब इस वीजा के लिए करीब 88 लाख रुपए फीस बढ़ा दी है. यह तय किया गया है कि जब तक 1,00,000 डॉलर का भुगतान न किया जाए, तब तक एच्-1बी कर्मचारी अमेरिका में प्रवेश नहीं कर पाएंगे. वीजा के लिए बढ़ी हुई फीस अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी टेक दिग्गजों को पर असर डालेगी. क्योंकि एच्-1बी वीजा पहले से ही महंगे हैं. हर वीजा की लागत पहले ही 1,700 से 4,500 डॉलर के बीच होती है. मतलब जितना जल्दी वीजा चाहिए उतनी ज्यादा फीस देना होगी. एच्-1बी वीजा होने वाला खर्च आमतौर पर कंपनियां उठाती हैं और यह उसके लिए व्यापार खर्च माना जाता है. यह आदेश 21 सितंबर से लागू होगा और यकीनन यह कंपनियों पर ज्यादा बोझ डालेगा. खासतौर पर इस बोझ से वो कंपनियां ज्यादा प्रभावित होंगी, जो टेक्नोलॉजी और IT सेक्टर में विदेशी कर्मचारियों को ज्यादा नौकरियां देती हैं. एच्-1बी ‘एंट्री-लेवल’ पदों के लिए भुगतान, रेगुलर कर्मचारियों की तुलना में 36 प्रतिशत कम होता है. कंपनियां कम श्रम लागत का फायदा उठाने के लिए अपनी आईटी शाखाएं बंद कर देती हैं, अमेरिकी कर्मचारियों को निकाल देती हैं और आईटी नौकरियां विदेशी कर्मचारियों को सौंप देती हैं. आदेश में यह भी कहा गया है कि एच्-1बी कार्यक्रम में कम वेतन वाले कर्मचारियों की अधिक संख्या, कार्यक्रम की साख को कमजोर करती है और अमेरिकी कर्मचारियों की मजदूरी और रोजगार के अवसरों को नुकसान पहुंचाती है. खासकर एंट्री-लेवल पर, उन उद्योगों में जहां ऐसे कम वेतन वाले एच्-1बी कर्मचारी केंद्रित हैं.
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